बुलाती है मगर जाने का नही! असे सांगणारे गझलकार यांचे राहत इंदोरी यांचे कोरणा मुळे निधन

इंदौर – प्रसिद्ध उर्दू शायर राहत इंदौरी यांचे कोरोनामुळे निधन झाले. ऑरबिंदो हॉस्पिटलमध्ये त्यांनी शेवटचा श्वास घेतला. कोरोनाची लागण झाल्याचं ट्विटवरून सांगितलं होतं. त्यांची कोरोना टेस्ट करण्यात आली होती. रिपोर्ट पॉझिटिव्ह आल्यानंतर त्यांना रुग्णालयात दाखल करण्यात आलं होतं.

सफर की हद है वहाँ तक की, कुछ निशान रहे |
चले चलो की जहाँ तक ये आसमाँ रहे |
– डॉ. राहत इंदौरी (1950-2020)

 

राहत इंदौरी यांनी मंगळवारी सकाळी ट्विट केलं होतं की, कोरोनाची सुरुवातीची लक्षणं दिसल्यानंतर सोमवारी कोरोना टेस्ट करण्यात आली होती. त्याचा रिपोर्ट पॉझिटिव्ह आला आहे. मी ऑरबिंदो हॉस्पिटलमध्ये असून लवकरच या आजाराला हरवेन अशी प्रार्थना करा असं म्हटलं होतं.

ट्विटरनंतर आणखी एक विनंती राहत इंदौरी यांनी केली होती. माझ्या तब्येतीची माहिती ट्विटर किंवा फेसबुकवरून देईन. मला किंवा घरी फोन करू नका.

रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं
रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है

मैंने अपनी खुश्क आँखों से लहू छलका दिया,
इक समंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए।

बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ

नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है

मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए

बोतलें खोल कर तो पी बरसों
आज दिल खोल कर भी पी जाए

मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया
इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए

शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे

सूरज सितारे चाँद मिरे सात में रहे
जब तक तुम्हारे हात मिरे हात में रहे

कॉलेज के सब बच्चे चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लिए
चारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है

दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए

वो चाहता था कि कासा ख़रीद ले मेरा
मैं उस के ताज की क़ीमत लगा के लौट आया

ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन
दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे
नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो

हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है

संबंधित वृत्त सकाळ’ने प्रकाशित केला आहे.

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